खुदको वक्त के हिसाब से बदलो |

 जो खुद को वक्त के हिसाब से नहीं बदलता वक्त उसे अपने हिसाब से बदल देता है या खत्म कर देता है।


भारतीय मुसलमानों के सिर्फ पांच प्रतिशत बच्चे ही मदरसों में जाते हैं बाकी पंचानबे प्रतिशत बच्चे दूसरी स्कूलों में जाते हैं। ये सोचने की बात है कि आखिर सिर्फ पांच प्रतिशत बच्चे ही मदरसों में क्यों जाते हैं? जबकि जकात खैरात सदका फितरा का नब्बे प्रतिशत पैसा मदरसों में जाता है।



जब आप इस तरह के सवाल करेंगे तो आपको मदरसा विरोधी, मौलवी विरोधी घोषित कर दिया जाएगा जबकि इन बातों पर गौर ओ फ़िक्र करने की जरूरत है।


आज जमाने के हिसाब से भारतीय मदरसे अपनी प्रसांगिकता खोते जा रहे हैं इसलिए आम मुस्लिम अपने बच्चों को मदरसों में न भेजकर दूसरे स्कूलों में भेजते हैं।


मदरसे वाले सिर्फ क़ुरान को रटाकर सोचते हैं कि हम कौम के साथ बहुत भलाई कर रहे हैं मगर असलियत बहुत अलग है।


आपने बच्चों को कुरान तो रटा दिया मगर आपने कभी सोचा कि ये मदरसों के बाहर की जिंदगी जी सकते हैं या नहीं?


रमजान में जब यूपी बिहार बंगाल से हाफिज चंदा करने आते हैं तब आप उनके हालात देखो रहम भी आता है और शर्म भी आती है। रेलवे स्टेशनों में टिकट के लिए फार्म भरने के लिए दूसरों के मोहताज फिरते हैं, सफर में जलील ओ ख्वार होते हैं। आखिर मदरसों में आपने उन्हें इतनी तालीम क्यों नहीं दिया कि मदरसों के बाहर भी जिंदगी जी सकें।


हाफिज आलिम बन गए तो वही पांच सात हजार की पगार में इमाम मुअज्जिन या मुदर्रिस की नौकरी, जाहिल जो अमीर बन कर मदरसों और मस्जिदों के ट्रस्टी बन गये उनकी जी हुजूरी, नौकरी कब चली जाए गारंटी नहीं तो फिर पंचानबे प्रतिशत लोग अपने बच्चों को मदरसों में क्यों भेजें?


मेरे एक पहचान के मौलाना हैं चार पांच भाई हैं सभी हाफिज आलिम कारी हैं सब बेरोजगार घूम रहे हैं जबकि उन्हीं के दूसरे रिश्तेदार पांच दस सालों में  करोड़पति बन गए हैं। मौलाना ने अपने बच्चों को हाफिज या आलिम नहीं बनाया बल्कि दूसरे स्कूलों में पढ़ाया है।


आसाम के मुख्यमंत्री का भाषण सुना वो कहते हैं कि हमने बच्चों से पूछा क्या बनना चाहते हो तो उन्होंने कहा डाक्टर इंजीनियर इसलिए हमने मदरसों को स्कूल में बदल दिया।


कोई दूसरा मदरसों के खिलाफ कदम उठाए या फिर कौम ही अपने बच्चों को मदरसों में भेजना बंद कर दे उससे पहले हम कोई नया तरीका क्यों न सोचें?

अभी भी पांच प्रतिशत जो बच्चे मदरसों में आते हैं उनमें वो बच्चे ज्यादा होते हैं जिनके मां बाप ग़रीब हैं अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में नहीं पढ़ा पाते अगर इन पांच प्रतिशत बच्चों के मां बाप के पास भी अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने के संसाधन पैदा हो गये तो फिर कितने प्रतिशत बच्चे मदरसों को जाएंगे आप खुद सोचिएगा।

अगर कोई मदरसों को अपग्रेड करने की बात करता है तो उन्हें अपना दुश्मन मत समझिए बल्कि उस पर गौर करिए।


मदरसों में इतना कुछ करिए की बच्चे दीन के साथ साथ दुनिया के साथ भी कदम मिलाकर चल सकें।


इस बात को दिमाग से निकाल दीजिए कि हम नहीं बदलेंगे। आप नहीं बदलोगे तो नुकसान आपका कौम का और दीन का होगा। अभी पांच फीसदी बच्चे आ रहे हैं कल को दशमलव पांच फीसदी बच्चे आएंगे फिर सिर्फ मदरसों की इमारतें देखना और गर्व से सीना फुलाना की देखो हमारे मदरसों की बिल्डिंग कितनी शानदार है।


मदरसे भी जरूरी है लेकिन इसके साथ साथ दुनियावी तालीम भी होना चाहिए अगर मदरसे में ही पड़ेंगे तो दुनिया से गाफिल हो जाएंगे दुनिया की तरक्की और दुनिया के साथ चलने का जो आज के दौर में दुनिया भी संचालन चल रहे हैं उससे अन्यभिग हो जाएंगे लेकिन अगर सिर्फ दुनियावी तालीम ही हासिल की है तो फिर कहीं ना कहीं आमिर खान और सलमान खान या और कोई बद्दीन जैसे ही पैदा हो जाएंगे इसलिए दोनों ही जरूरी है


हममें और उनमें एक फर्क है हम चाहते हैं कि मदरसे ऐसे हो जाएं की नब्बे प्रतिशत मुस्लिम बच्चे मदरसों में जाने लगें ताकि हर मुस्लिम बच्चा दुनिया के साथ साथ दीन से जुड़ा रहे जबकि वो चाहते हैं कि पांच प्रतिशत बच्चे ही मदरसों में पढ़ें बाकी दूसरे स्कूलों में जाएं।


हम चाहते हैं कि मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे इस काबिल होकर निकलें की वह किसी की जकात के मोहताज न रहें बल्कि जकात देने वालों की लिस्ट में शामिल हो जाएं जबकि वो चाहते हैं कि मदरसों से निकलने वाले बच्चे जकात में ही गुजारा करें।


उनकी नजर में हम मदरसों के विरोधी हैं और वो खुद मदरसों के हमदर्द हैं जबकि हमें लगता है कि हम मदरसों के उनसे बड़े हमदर्द हैं।


मूली सांप से जकात के पैसे का हिसाब मांग लो भड़क जाते हैं यही फर्क है हमारी आपकी सोच में और उनकी सोच में


गौर_करिएगा

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